तेग़ मुंसिफ हो जहाँ दारो रसन हों शाहिद, बेगुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा."
अली सरदार जाफ़री का ये शेर आज से तक़रीबन साढ़े 31 बरस पहले मैंने साप्ताहिक 'रविवार' में अपनी उस रिपोर्ट में लिखा था जिसे हाशिमपुरा नरसंहार के बाद प्रकाशित किया गया था. मेरी उस रिपोर्ट का शीर्षक था "दंगों से ज़्यादा ख़तरनाक था दंगों को रोकने का तरीक़ा."
आपकी ज़िंदगी में कुछ घटनायें ऐसी होती हैं जो दिल-दिमाग़ पर कुछ इस तरह चस्पा हो जाती हैं जिन्हें आप चाहकर भी भुला नहीं पाते.
31 बरस पहले मेरठ में हुए ख़ौफ़नाक दंगे मेरी स्मृति में कुछ इसी तरह बैठ गए हैं और मुझे लगातार 'हौंट' करते रहते हैं.
31 बरस पुराना दर्द
मेरा ज़मीर लगातार मुझे इस बात के लिए धिक्कारता रहता है कि इतना बड़ा ज़ुल्म ओ सितम तुम्हारी आँखों के सामने हुआ और तुम उसे सिर्फ़ रिपोर्ट करके ख़ामोश बैठे रहे.
तुमने मज़लूमों को इंसाफ़ दिलाने के लिए कुछ भी नहीं किया. जिन मज़लूमों को तुम दिलासा देकर आये थे कि तुम उन लोगो के लिए लड़ोगे और इंसाफ़ दिलाओगे उनके पास दोबारा लौट कर भी नहीं गए.
मेरठ में सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला अप्रैल 1987 में शुरू हुआ था जो तक़रीबन तीन माह तक चला. मैं इन दंगो का प्रत्यक्षदर्शी था और उन्हें लगातार रिपोर्ट कर रहा था.
उस दौरान आपसी दंगों में क़रीब सौ लोग मारे गए थे. लेकिन सबसे ख़तरनाक क़त्लेआम शहर के हाशिमपुरा और नज़दीक के एक गांव मलियाना में 22 और 23 मई 1987 को हुआ जिसमें तक़रीबन सवा सौ बेगुनाह मुसलमानों को जो ज़्यादातर नौजवान थे पुलिस और पीएसी की गोलियों से भून दिया गया.
'डर था कि किसी अंग पर पांव न पड़ जाए..'
हाशिमपुरा नरसंहारः फ़ैसले से जुड़ी 10 बातें
जब सेना ने चलाई गोलियां
चौंकाने वाली बात तो ये है कि स्वतंत्र भारत में 'कस्टोडियल किलिंग' के इस सबसे बड़े मामले को अंजाम देने में सेना की मदद ली गयी और हाशिमपुरा मुहल्ले से रमजान के महीने में 22/23 मई की रात 50 से ज़्यादा मुस्लिम नौजवानो को सेना की निगरानी में गिरफ़्तार किया गया.
बाद में पीएसी ने उन्हें ग़ाज़ियाबाद ज़िले के दो स्थानों मुरादनगर क़स्बे के नज़दीक गंग नहर पर और दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर स्थित मकनपुर गांव के नज़दीक हिंडन नदी में गोली मारकर बहा दिया.
तक़रीबन साढ़े 31 साल बाद हाशिमपुरा नरसंहार मामले में तो दोषी 16 पीएसी वालों को आजीवन क़ैद की सज़ा सुना भी दी गई.
लेकिन 23 मई 1987 को मलियाना नरसंहार मामले में तो अभी अदालती कार्यवाही शुरू भी नहीं हुई है जहाँ 72 मुसलमानों को पीएसी की एक प्लाटून ने गोली मारकर एक कुएं में दफना दिया था.
ढाई बरस पहले 30 मार्च 2016 को 'द हिन्दू' अख़बार ने इस मुक़दमे की कहानी प्रकाशित करते हुए लिखा था कि 800 तारीख़ें पड़ने के बावजूद इस्तग़ासे के 35 गवाहों में से सिर्फ तीन को 'क्रॉस एग्ज़ामिन' किया गया है और इस मुक़दमे की असल एफ़आईआर ग़ायब है.
क्या 'हाशिमपुरा' बार-बार होते रहेंगे?
हाशिमपुरा पर फ़ैसले में किसकी 'हार' हुई?
ईमानदार पुलिसवाले का काम
हाशिमपुरा नरसंहार का मामला तो इसलिए लोगों के सामने आ सका क्योंकि उस समय ग़ाज़ियाबाद में एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस कप्तान विभूति नारायण राय एसपी थे और उन्होंने इस घटना की रिपोर्ट थाना लिंक रोड में दर्ज करवा दी थी.
इसके आधार पर सीबी सीआईडी ने जांच की और मुक़दमा पहले ग़ाज़ियाबाद की एक अदालत और फिर दिल्ली की तीस हज़ारी अदालत में चला.